Tuesday, June 18, 2013
A Introduction of Allahabad
एक सुस्ताया सा शहर जो जागने के बाद दही-जलेबी संग जोर की अंगडाई लेता है फिर कुल्ला करता है ! प्रयाग स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक से टहलते हुए, वो यूनिवर्सिटी रोड की किताब गली से होते हुए कटरा बाज़ार में ग़ुम हो जाना, नेतराम की कचौरिया, लक्ष्मी टाकिज पर चाय और समोसे की पार्टी उड़ाना ! वही कुछ दूर पर खामोश खड़े आनंद भवन के साए में आलू टिक्की और फुलकी दबाना, थोडा और आगे जाने पर सदियों का इतिहास समेटे कंपनी बाग़ जो शहर का दिल बन के धडकता है, वही गेट के बगल में खोखा राय का ठंडा दही-वडा का ठेला जो मैकडी/पिज़्ज़ा हट की चमक में फीका पड़ दौड़ से बाहर हो चला है ! थोडा और आगे जाने पर हाईकोर्ट के पास फुटपाथ के किनारे की लिट्टी-बाटी अक्सर फाइव-स्टार को टक्कर देती नज़र आती है स्वाद के मामले में ! वही से कुछ दूर पे सिविल-लाइन्स झिलमिलता नज़र आता है वही कही एक पान की दूकान और सोडा का मुकाम ! वहां से जॉनसेनगंज की भीड़-भाड़ से होते हुए चौक की तंग गलियों तक का सफ़र, वही रस्ते में वो नीम का पेड़ आज भी मौजूद है जिसकी कहानिया सुनहरे शब्दों में दर्ज है ! नखासकोना से गुजरते हुए सुलाकी की दूकान तक की जद्दोजहद और ईनाम में रसमलाई, बस मिठास में खो ही जाइये ! अगर हॉर्न की आवाज़ से परेशान हो जाये तो बस वहां से सरस्वती-घाट की ओर मुड जाइये ! एक चुरमुरे का देसज कोन लेना और सीढियों पर जा कर बैठ जाना ! गंगा की चंचलता और यमुना की गहराई, उस पर नाव खेता एक मल्लाह - जीवन का दर्शन बयान करता है ! माहौल का सुकून पुल से गुजरती रेलगाड़ियो से भंग सी होता है !! सूरज भी ढलते-ढलते अपना थोडा सा सुनहरा रंग गंगा-जमुना में छोड़ जाता है जो रात के साथ मिल के थोडा और गहरा हो जाता है ! वक़्त बस वही थम सा जाता है !!
कहाँ से मिलेगा ये सब एक दौड़ते-भागते महानगर में ??
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